कादम्बरी में वर्ण व्यवस्था
श्रीमती रश्मि कुशवाह
शोधार्थी (संस्कृत), शोध अध्ययन केन्द्र, शा. स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय दतिया म. प.
भारतीय संस्कृति की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक विशेषता वर्ण व्यवस्था हैं। वर्ण व्यवस्था का प्रारम्भ ़ऋग्वेद के समय सें ही हुआ हैं । ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में एक मन्त्र द्वारा ब्राह्मणादि वर्णो के स्थान का निर्धारण किया गया है। इसके अनुसार ब्राह्मण को परम् पुरूष का मुख , क्षत्रिय को बाहु वैश्य को उरू तथा शूद्र को चरण बताया गया हैं । 1 इससे स्पष्ट होता है कि आर्यांे की वर्ण व्यवस्था अत्यंत ही प्राचीन है।
वर्ण व्यवस्था भारतीय संस्कुति का अत्यन्त प्राचीन अंग है । इसके प्रति वैदिक युग से आज तक बराबर श्रद्धाभाव चला आ रहा है । हमारी सामाजिक व्यवस्था का आधार ही यह वर्ण व्यवस्था है । बौद्ध धर्म ने इसी व्यवस्था को नष्ट करने का प्रयत्न किया था और वैदिक धर्म के पुनरूत्थान के साथ इसका भी पुनरूत्थान हुआ । बराहमिहिर ने अपनी वृहत्संहिता में कहा है कि नगर में ब्राह्मणांे,क्षत्रिया,ें वैश्यों और शूद्रांे के निवास स्थान निश्चिित थे । ह्वेन्त्सांग ने भी चारों वर्णांे का उल्लेख एवं उनके कार्यकलापों का विवरण दिया है। स्मृतियों के अनुसार प्रत्येक वर्ण के कर्म निश्चिित थे किन्तु बाण के युग तक आते आते वर्ण व्यवस्था में कुछ शिथिलता आ गई थी। एक वर्ण के लोग दूसरे वर्ण के कर्म को अपनाने लगे थे। ह्वेन्त्सांग ने ब्राह्मण कृषक का उल्लेख किया है। 2 तथा दशकुमारचरित में ब्राह्मण डाकुओं की बस्ती का उल्लेख है। 3 किन्तु वर्णाश्रम धर्म के विरूद्ध आचरण अपवाद स्वरूप ही था। अधिकांशतरू लोग वर्णव्यवस्था के अनुसार ही कर्म करते थे ।
विवाह सम्बन्ध भी विभिन्न वर्णों में परस्पर होते थे। तत्कालीन साहित्य में अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के उल्लेख प्रचुरता से मिलते है । नाटकों और कथा साहित्य में ब्राह्मणांे को गणिकाओं की पुत्रियों और दासियों से विवाह करते बतलाया गया है । मृच्छकटिकम् नाटक में चारूदत्त ने वसन्तसेना से विवाह किया था। चारूदत्त ब्राह्मण था और वसन्तसेना गणिका । इसी नाटक में शर्बिलक नामक ब्राह्मण ने वसन्तसेना की दासी मदनिका से विवाह किया था। बाण द्वारा पारशव भाइयों का उल्लेेख 4 इसका द्योतक है कि इनकें पिता ने शूद्रा से विवाह किया था । किन्तु ऐसे विवाह अपवाद स्वरूप ही थे।
चाण्डालों और शबरों का उल्लेख भी कादम्बरी तथा हर्षचरित दोनों में उपलब्ध है।
ब्राह्मण
वर्णो में ब्राह्मण का स्थान प्रमुख था। बाण के समय वैदिक धर्म के उत्थान के साथ .साथ ब्राह्मणों के सम्मान में अत्यधिक वृद्धि हो गई थी । लोग ब्राह्मणांे का कितना अधिक सम्मान करते थे इसका आभास हमें हर्षचरित से मिलता है जब सावित्री दुर्वासा को शाप देने के लिये उद्धत होती है तो सरस्वती रोकती हुई कहती है कि ब्राह्मण तो जाति से ही माननीय हैं भले ही वे सुसंस्कृत न हों । 5
गीता में ब्राह्मणों के कर्म के विषय में लिखा है-
शमो दमस्तपरू शौचं क्षन्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।।6
अर्थात् शान्तिप्रियता, आत्मसंयम ,तपस्या,पवित्रता,सहिष्णुता ,सत्यनिष्ठा ,ज्ञान -विज्ञान तथा धार्मिकता -ये सारे स्वाभाविक गुण हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते हैं ।
गृहस्थ ब्राह्मण
बाण ने अपने पूर्वजों एवं भाइयों, जाबालि मुनि और हारीत के प्रसंग में ब्राह्मणों के कर्तव्यों तथा गुणों पर प्रकाश डाला है । इस युग के ब्राह्मण विद्याव्यसनी तथा वेदविद्या के पण्डित थे जो ब्राह्मण वंशपरम्परा को अविच्छिन्न रखने के लिये विवाह करते थे, वे भी अध्ययन -अध्यापन का क्रम जारी रखते थे । बाण के पूर्वज वात्स्यायन किन गुणों से युक्त थे इसका बाण ने विशद वर्णन किया है । वे यशस्वी ,प्रतापी,सदाचारी,गम्भीर,छल,दम्भ,कपटादि दोषांे से रहित,प्रसन्न स्वभाव वाले ,बुद्धिमान्,धैर्यवान् ,दयालु, क्षमावान्, नम्र ,कवि,कलाविद्,कुशलवक्ता,मधुरभाषी ,परिहास कुशल ,सत्यवादी,मिलनसार और चतुर थे। वे याचना और परनिन्दा से विमुख थे। वे यज्ञप्रिय ,जितेन्द्रिय और सन्तोषी थे। सभी प्राणियों पर वे प्रीति रखते थे । राजा और मुनियों द्वारा यह वंश पूज्य था ।7
ऋषि
इन वर्णनो के साथ कादम्बरी में वर्णित जाबालि ऋषि के तेजस्वी व्यक्तित्व का उल्लेख करना भी अनुचित न होगा । तत्कालीन ऋषियों का परिचय पाने क लिये जाबालि मुनि का वर्णन ही पर्याप्त है । ये करूणा , क्षमा , सन्तोष ,ज्ञान ,धर्म, विद्या, उत्साह ,सदाचार , तप , सत्य तथा सत्वगुण के आगार थे। वे सत्पथ के उपदेशक और अमंगल के निवारक थे ।8
ब्राह्मण विद्यार्थी
बाण ने हारीत के वर्णन में उस समय के ब्रह्मचारी ब्राह्मण विद्यार्थी का चित्र उपस्थित किया है । वह तप संयम एवं अध्यावसाय की साक्षात् मूर्ति था। वह जितेन्द्रिय था तथा समाधि लगाता था ।
ह्वेन्त्सांग ने भी ब्राह्मणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि “देश की विभिन्न जातियों और श्रेणियोें में ब्राह्मण सबसे अधिक पवित्र और सबसे अधिक सम्मानित थे। उनकी सुख्याति के कारण भारतवर्ष के लिये “ ब्राह्मण देश” नाम भी सर्वसाधारण में प्रचलित था।9
सोमपायी ब्राह्मण
इस समय ब्राह्मणों में सोमपायी ब्राह्मण श्रेष्ठ माने जाते थे। कुछ विशिष्ट ब्राह्मणों को ही सोमपान का गौरव प्राप्त था। हर्ष को अपना परिचय देते हुए बाण ने कहा था कि मंैने सोमपान करने वाले वंश में जन्म लिया है।10
ब्राह्मणों की जीविका
ब्राह्मण लोग अपनी जीविकोपार्जन के लिये भिन्न -भिन्न व्यवसायांे में लगे हुए थे। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि ब्राह्मणों का बहुत बड़ा वर्ग अध्ययन -अध्यापन के कार्य में लगा हुआ था। यही कार्य सर्वाधिक गौरवमय समझा जाता था । यज्ञ सम्पादन का कार्य भी ब्राह्मणों का ही था । राजमहलों में तो यज्ञादिक अनुष्ठानों के लिये कुल पुरोहित रहता ही था। राजाओं एवं सम्पन्न नागरिकों से दान स्वरूप भूमि भी जीवन -यापन का साधन थी। कुछ ब्राह्मण शासन के अन्तर्गत दायित्वपूर्ण पदों पर कार्य करते थे। कादम्बरी में तारापीड का मन्त्री शुकनास ब्राह्मण था। राज भवन के अन्तःपुर का कञ्चुकी नामक कर्मचारी ब्राह्मण ही होता था ।
क्षत्रिय
ब्राह्मणों के पश्चात् द्वितीय सम्मानित वर्ण क्षत्रिय था। क्षत्रियों के कई राजवंश बाण के समय में थे। वीरतापूर्वक युद्ध करना, दान देना और रक्षा करना ये क्षत्रिय के कर्म है।क्षत्रिय को दान नहीं लेना चाहिये।
मौखारि आदि राजा क्षत्रिय ही थे। राज्यश्री का विवाह मौखारिवंश में किया गया था। यह वंश उस समय क्षत्रियवंशों में श्रेष्ठ माना जाता था। अधिकांश राज्यों में सेनाध्यक्ष क्षत्रिय ही थे तथा सेना में उन्हीं का प्राधान्य था।ं प्रभाकरवर्द्धन , राज्यवर्द्धन ,हर्ष ,यशोमती, राज्यश्री के उदात्त चरित्र तत्कालीन क्षत्रिय नर-नारियों के कार्यकलापों का जीता जागता उदाहरण है।
श्रीमद्भागवत में क्षत्रिय के स्वाभाविक गुणों का निरूपण इसप्रकार है-
तेजो बलं धृतिः शौर्यं तितिक्षौदार्यमुद्यमः।
स्थैर्यं ब्रह्मण्यतैश्वर्य क्षत्रप्रकृतयस्त्विमाः ।।11
अर्थात् तेज, बल,धैर्य, वीरता, सहनशीलता,उदारता, उद्योगशीलता,स्थिरता , ब्राह्मणभक्ति और ऐश्वर्य ये क्षत्रिय वर्ण के स्वभाव हंै। प्रभाकरवर्द्धन शत्रुविजेता,स्वाभिमानी एवं पराक्रमी कहा गया है। उसने विग्रह को अनुग्रह ,समर -आगमन को महोत्सव , आकस्मिक आक्रमण को भाग्यवृद्धि, और शस्त्रप्रहारांे को सम्प्रतिप्रहार समझा वह यज्ञ-प्रेमी तथा ब्राह्मणों को दान देने वाला था। 12 इस प्रकार बाण ने जिन क्षत्रिय पुरूषों का चित्रण किया है उनसे तत्कालीन क्षत्रियों के गुणों का परिचय मिलता है। बाण ने क्षत्रिय नारियों को पतिव्रता तथा वीर नारियों के रूप में चित्रित किया है । यशोमती तथा राज्यश्री दोनो ही वीर रमणियंा हंै ।
इस प्रकार बाण ने क्षत्रिय नर -नारियों का जैसा वर्णन किया है, उससे ज्ञात होता है कि इस काल मे क्षत्रिय शास्त्रोक्त क्षात्र -धर्म का पालन करते थे।
वैश्य
वर्ण -व्यवस्था में तीसरा स्थान वैश्य वर्ण का है। श्रीमद्भागवत में वैंश्यों के स्वाभाविक गुणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है-
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम् ।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्य प्रकृतयस्त्विमाः ।।13
अर्थात् आस्तिकता, दानशीलता,दम्भहीनता, ब्राह्मणों की सेवा करना और धनसंञ्चय से सन्तुष्ट न होना , ये वैश्य वर्ण के स्वभाव हंै ।
नारदजी ने युधिष्ठिर को वैश्य की जीविका के विषय में बताया है-
वैश्यस्तु वार्तावुत्तिश्र नित्यं ब्रह्मकुलानुगः। 14
अर्थात् वैश्य को सर्वदा ब्राह्मणवंश का अनुयायी रहकर गौरक्षा ,कृषि एवं व्यापार के द्वारा अपनी जीविका चलानी चाहिए।
कादम्बरी काल में वस्तुतः ब्राह्मणों और क्षत्रिय ये दो वर्ण ही समाज में प्रमुख थे । क्षत्रिय वर्ण राज्य के अधिकारी तथा ब्राह्मणों के प्रधानमन्त्री होने के कारण ये दो वर्ण ही समाज पर छाये हुये थे। यही कारण है कि बाण ने इन दोनांे वर्णांे का वर्णन जिस विशदता से किया है वैसा वैश्य तथा शूद्र वर्ण का नहीं। सम्भवतः कादम्बरी कथा में उनको इन दो वर्णांे का विशद वर्णन करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ।
बाण ने स्थाण्वीश्वर के वर्णन के प्रसंग में लिखा है कि व्यापरियों ने स्थाण्वीश्वर को लाभभूमि माना था। 15 इस समय भारत ने व्यापार में बहुत उन्नति की थी। वैश्यों ने व्यापार से भारत को समृद्ध बना दिया था । बाण ने उज्जयिनी वर्णन में बाजारों में सुवर्ण , रजत आदि बहुमूल्य पदार्थों के बाहुल्य का उल्लेख किया है। बाण ने वैश्यों के एक दोष चोरी का उल्लेख किया है बाण ने वैश्यों के एक दोष चोरी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ”ऐसा वैश्य जो चोरी न करता हा,े पाना दुर्लभ है।“ 16 ह्वेन्त्सांग के अनुसार वैश्य वस्तुओं का विनिमय करते थे और लाभ के लिये निकट तथा दूर देशो में जाते थे।17
शूद्र
वर्ण व्यवस्था में चतुर्थ स्थान शूद्र -वर्ण का है। शूद्र का धर्म है द्विजातियों की सेवा ं। उसकी जीविका का निर्वाह उसका स्वामी करता है।
श्रीमद्भागवत में शूद्र के स्वभाव को बतलाते हुए कहा गया है-
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया ।
तन्त्र लब्धेन सन्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमा ।।18
अर्थात्, ब्राहाण ,गौ और , देवताओं की निष्कपट भाव से सेवा करना और उसी से जो कुछ मिल जाये, उसमें सन्तुष्ट रहना ,ये शूद्र वर्ण के स्वभाव हंै ।
शूद्रांे के कर्म के विषय में गीताकार ने कहा है-
परिचर्यात्मक कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ।19
अर्थात् सब वर्णांे की सेवा करना , शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
बाणकालीन समय में अश्वशाला ,गजशाला के भृत्य तथा सेना के साथ जिन भृत्यों को भेजने का उल्लेख है,वे शूद्र वर्ण के ही थे पतञ्जलि ने शूद्रों की अनेक श्रेणियों का उल्लेख किया है। बाण ने भी व्योंकार (लुहार) का उल्लेख किया है। 20
चाण्डाल
चाण्डाल अस्पृश्य समझे जाते थे। चाण्डाल कन्या जब शूद्रक के राजभवन में आती है तो दूर से ही बंास फटकारकर अपने आने की सूचना देती है। 21 बाण ने उसे स्पर्शवर्जित 22 चित्र के समान केवल देखने योग्य 23 तथा चाण्डाल कुल में उत्पन्न होने के कारण दूषित कहा है । 24 शूद्रक उसे देखकर कहता है कि विधाता ने अशेष रूप का उपहास करने वाला सौन्दर्य देकर भी इसे स्पर्श और सम्भोग के लिये अनुपयुक्त कुल मे जन्म क्यों दिया है। 25 इनकी बस्ती नगर से दूर बसायी जाती थी।
शबर
ये विन्ध्यवन में रहते थे। इनकी जीविका का मुख्य साधन आखेट था । इनका जीवन अत्यन्त कठिन था। ये अत्यधिक निर्धन थे। शहद,फल,मांस आदि वन से प्राप्त वस्तुएॅ ही इनके जीवन धारण का साधन थी। ये दुर्गा के पूजक थे तथा एक सेनापति के नीचे संगठित होकर रहते थे। आखेट के समय पूरा का पूरा शबर दल आखेट के लिये निकलता था। शिकार के लिये शिकारी कुत्ते पाले जाते थे। 26
सन्दर्भ
(1) ब्राह्मणोंऽस्य इत्यादि ऋग्वेद - 10ध्90ध्12
(2) हर्षवर्द्धन - श्री गौरीशंकर चटर्जी - 181(संस्करण -1938 )
(3) दशकुमार चरित -टीकाकार -श्री विश्वनाथ झा पृष्ठ -71, 72, संस्करण -1966
(4) हर्षचरित प्रथम उच्छवास -पृष्ठ -19- काणे संस्करण
(5) हर्षचरित प्रथम उच्छवास - पृष्ठ -4
(6) श्रीमदभगवद्गीता - 18ध्42
(7) हर्षचरित प्रथम उच्छवास- पृष्ठ - 18
(8) जाबालि वर्णन कादम्बरी
(9) आॅन युवानच्वांग्स टेªवल्स इन इण्डिया वाटर्स- प्रथम भाग - पृष्ठ -140- संस्करण- 1961
(10) ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम्- हर्षचरित द्वितीय उच्छवास- पृष्ठ -36
(11) हर्षचरित- चतुर्थ उच्छवास
(12) श्रीमद्भागवत - 11ध्17ध्17
(13) श्रीमद्भागवत - 11ध्17ध्18
(14) श्रीमद्भागवत - 11ध्17ध्15
(15) हर्षचरित तृतीय उच्छवास - पृष्ठ -44
(16) वणिगत स्करः- हर्षचरित षष्ठ उच्छवास
(17) आॅन युवानच्वांग्स टेªवल्स इन इण्डिया वाटर्स- प्रथम भाग - पृष्ठ -168- संस्करण- 1961
(18) श्रीमद्भागवत - 11ध्17ध्19
(19) श्रीमद्भगवत गीता - 18ध्44
(20) हर्षचरित सप्तम उच्छवास पृष्ठ -68
(21) कादम्बरी - पृष्ठ -29
(22) अमूर्तामिव स्पर्शवर्जिताम आलेख्य - कादम्बरी पृष्ठ -34
(23) कादम्बरी - पृष्ठ -34
(24) मातंगकुल दूषिताम्- कादम्बरी - पृष्ठ - 34
(25) स्पर्श- सम्भोग -सुखे कृतं कुले जन्म -कादम्बरी पृष्ठ - 35
(26) शबर जाति का वर्णन -कादम्बरी - पृष्ठ - 66
Received on 01.12.2014
Revised on 15.12.2014
Accepted on 30.12.2014
© A&V Publication all right reserved
Research J. Humanities and Social Sciences. 5(4): October-December, 2014, 466-469